गलियारों की सैर, कोई कल्पना नही बल्की मेरे वो मन के भाव हैं, जिन्हें मैंने महसूस किया है। गलियारों की सैर, एक ऐसा निर्मल भाव प्रस्तुत करती है... जिसे जान कर, समझ कर आप भी अपने गलियारों में लौट जाना चाहेंगे! - अंकुर शरण
Sunday, March 31, 2013
दिलों में घोंसले
Wednesday, March 20, 2013
विचारों के बीज
फिर क्या था, एक और सपना अंकुरित हुआ और एक साल बाद मुझे एक बाग़ प्रदर्शनी के दौरान सम्मानित किया गया। जिन ज़नाब से मैं पहले नहीं मिल पाया, उन्हें प्रथम स्थान मिलते हुए देखा और मैंने उन्हें बधाई देते हुए धन्यवाद दिया। मेरे इस खास दिन का श्रेय, निसंदेह उन्हें भी जाता है।
अखबार में नाम प्रकाशित हुआ, एक सुन्दर सी ट्रोफी मिली जिसे देख कर परिवार जनों और मित्र बंधुओं को ख़ुशी मिली और मुझे एक सुकून क्योंकि अब कई और सपने भी तो साकार करने है।
मेरी फुलवारी की सैर से आपको भी कुछ एहसास जरुर होगा, विचारों के बीज बस अपने मन के बाग़ में संजोते जाए -जीवन में हरियाली बनी रहेगी ।
Tuesday, March 19, 2013
जीवन और स्वास्थ्य
अब स्वास्थ्य के लिए चिंता करने की भी कोई जरुरत नहीं। चिंता से कभी परेशानिया दूर नहीं होती बल्कि हमारे दिमाग को और भी कुंठित कर देती है। सकारात्मक दृष्टिकोण रखे, आपको बल मिलेगा विपरीत परिस्थियों से निपटने का और दुसरो को समझाने का । कुछ चीजे आप परिस्थितियों के कारण सीख जाते है।
सिर्फ एक काम - खुद को स्वस्थ रखने की हर मुमकिन कोशिश करनी है और जीवन में आने वाली चुनौतियों का डट कर मुकाबला करना है । दुसरो से ज्यादा , खुद पर भरोसा करना है - स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए किसी और की नहीं, आप के ख़ुद के प्रयास की ज़रूरत है। अनुशाशन से हर कार्य संभव है। खुद के लिए समय निकाले, अच्छे विचारो को निरंतर पढ़ते रहे। स्वयं में इतनी जागरूकता आजायेगी की अपने आप, हर नामुमकिन कार्य संभव हो जाएगा और वैसे ही हमारा जीवन के प्रति नज़रिया।
Saturday, December 29, 2012
वो चली गयी
उस अंधकार की सुबह अब न होगी,
न उस शरीर की हालत अब और बत्तर होगी।
जितनी कायरता से समाज ने उसे ये दर्द दिया,
उसकी आत्मा भी हमे कही न कही कोसती होगी।
हम सब ने बहुत आँसू बहा लिए,
धरना प्रदर्शन किया और मोम के दिए भी बहुत जला दिए।
आज भी हम उसी राह पर जा रहे है,
आज भी उन्ही बंद दरवाजो पे लटकती कुण्डी खटखटा रहे हैं।
फिर से कोई न कोई सत्ता के गलियरो से आवाज दे देगा,
फिर से नया पैंतरा और परिवर्तन का आघाज़ हम में भर देगा।
रोज मर्रा की जिंदगी में हम फिर न खो जाये,
आज तो एक जुट हुए है,
कल फिर न इस दर्द को भूल जाये।
सब का साथ तो ठीक है,
पर अब द्रन्संकल्प भी चाहिए।
दिल्ली ही नहीं, देश की किसी गली में अब कभी यह घटना न होनी चाहिए।
वह चली तो गयी,
पर एक चिंगारी हमारे सीने में जला गयी है।
इतिहास के पन्नो में,
समाज की इस बर्बरता को आईना दिखा गयी है।
- अंकुर शरण
Friday, September 23, 2011
न वो वक़्त रहा, ना ये वक़्त रहेगा
जिंदगी दबी पाँव हमारे संग चलती जाती है, परिवर्तन होते जा रहे है ओर हम रोज भाग दौड़ की दिनचर्या में ही लगे रह जाते है। ये आज हर घर की कहानी हो गयी है, रोज भागो ओर शाम को थके मानदे आकर सो जाओ।
आखिर कब तक, जानवरों सा जीवन हम जीना है। ये हमारी कमजोरी है या हमारा नजरिया, जो हम रोज रोज एक ही तरह की दिनचर्या को देख के उन्हें अपने जिंदगी के साथ संजो लेते है। बस उसे ही अपने जीवन का पहलु मान लेते है। हम अपनी सोच के गुलाम हो कर, कुए के मेंढक की तरह जीवन गुजार देते है.
आज मैं बहुत कम चेहरे देखता हू, जो दिल से खुश दिखते है। किसी न किसी को कोई परेशानी सता रही है। सब चाहते तो है की वो खुश रहे पर कोई कुछ मेहनत नहीं करना चाहता। मैं मानता हू, सवाल पूछना जितना आसान होता है उतना शायद जवाब देना नहीं हो। मगर फिर भी हम यू ही जिन्दगी को तो नहीं जाने दे सकते।
आज इंसान सब चीज को बस में कर लेना चाहता है, दौलत, शोहरत। इतिहास से ही वर्तमान का जनम हुआ ओर भविष्य भी ऐसा ही होता आएगा जब तक हम अपनी मन् की धारणा को नहीं बदलेंगे।
हमे आज किसी और की नहीं बल्कि अपने आप की जरुरत है। खुद को देखो ओर खुद के करीब जाने की सोचो....उतना आसन नहीं होगा। हमने अपनी जिन्दगी सिर्फ ४ दिवारी के अन्दर सिमित जो कर ली है। हम वो कर रहे है, जो हो रहा है, वो तो सोच नहीं पाते जो हम भी कर सकते है।
३ घंटे सिनेमा देखना आसान है पर ३ मिनट भी हम खुद के लिए नहीं निकल पाते। जन्हा हम खुद से सवाल जवाब कर सके। खुद से पूछे - की क्या ये जो चल रहा है वो सही है? क्या हम इससे भी अच्छा कर सकते है? जरुर कर सकते है बस खुद पर विश्वास करने की देर है।
हमे ये समझना होगा की ये दिन जो है वो कल नहीं आने वाले। जैसे बचपन नहीं लौट सकता। अपने आज को हस के जीना है। विश्वास के साथ की जो होता है अछे के लिए होता है ओर यदि कुछ अच्छा नहीं हो रहा तो विश्वास रखना चाहिए की इस्श्वर ने जरुर हमारे लिए सोच रखा होगा।
एक सकारात्मक सोच ही क्रांति लाती है। कुछ नया करने की चाहत ही हमे दुसरो से अलग राह पर ले जाती है। हर इंसान की एक अपनी शख्सियत है। कभी खुद को निचा नहीं समझना है , भगवान् सब देखता है। जिसने वक़्त की नजाकत को भाप लिया वही एक सफल जीने की कला सीख पायेगा।
आज मैं भी जब महान हस्तियों की जीवनिया पढता हू, उनके लेख से ना जाने एक क्रांति सी आजाती है। बस अपने जीवन का अर्थ समझना चाहता हू। या ये कहू की जीवन एक राह है , अपना अस्तित्व पाने का।
अपने वक़्त को साथ रख कर वो हर काम करना है , जीसी हम करना चाहते है। किसी ने सच ही कहा है, न वो दिन रहे ओर ना ये दिन रहेंगे...!
Wednesday, November 17, 2010
सपनो का गलियारा
हम हमेशा सपने की बात करते है, कल के बारे में सोचते है। आज से ज्यादा, कल पर यकीन करते है। क्या सपने इतने प्यारे होते ही हैं ? या सपनो को भी जीने के लिए हम सपनो की दुनिया की तलाश करते है? मैंने भी महसूस किया है, कई सपनो को सजीव करने की चाहत में हम आज को भूल जाते है ओर एक अलग सपने के पीछे भागने लगते है। हम यह भी ध्यान नहीं देते की कई सपने हमारे आज सच हो गए है, जिन्हें कभी हमने देखे थे।
भाग दौड़ में हम खुद को भुला बैठे है। अचानक किसी रोज़ बैठ कर फिर से अपने गलियारों में अतीत के लम्हों में चले जाते है। काश यह होजाता, काश ये कर लेते। हमे "काश " शब्द से अवकाश लेना है। हमे सपनो की सच्चाई को समझना है। हमे अपने मन् के हर ख्यालो का ख्याल रखना है ओर उसकी जरूरतों को खुद से जोड़ना है। क्या मन् में आने वाला ख्याल हमारे भले के लिए है भी की नहीं।
हम खुद को दुनिया का सबसे समझदार मानने की सब से बड़ी मुर्खता करते है। जो हो रहाहै वही सत्य है ओर जो होगा वो किस्मत। फिर सपनो का क्या ? सपने देखना चाहिए ओर सपनो को पूरा करने का हौसला भी खुद को देते रहना चाहिए। सपने जब हकीकत बन जाते है तो दुनिया में उससे ख़ुशी कंही और नहीं।
क्या सपने भी किस्मत देख के हमे चुन्न ते हैं?
नहीं न, फिर हम हर सपनो को बिना सोचे समझे क्यों सच करने में जुट जाते है? हमे जिंदगी में अपने सपनो के महत्त्व को समझना होगा, क्योंकि कल जब ये सपने पुरे हो तो उसे जीवंत करने की जिम्मेदारी भी हमारी ही होगी। हमे सपनो का दायरा बढ़ाना है। हमे अपने आप को सपनो से नहीं बल्कि सपनो को खुद से जोड़ना है। जो हो रहा है वो अच्हा है ओर जो होगा वो उससे भी अच्छा होगा।
हम भगवन से बहुत कुछ मांगते है, जो मिला उसे तो आशीर्वाद समझ लिया ओर जो न मिला - वो किस्मत के हवाले। हमे बचपन से मांगने की ऐसी आदत पड़ जाती है की उम्र भर बस मांगते ही रहते है। कभी भगवान से , कभी माँ बाप से, कभी दोस्त तो कभी पड़ोसी। हमारी मांगने की ऐसी आदत पड़ गयी है की हम देने की सोच से ही अज्ञान है। हम भी कुछ दे सकते है, यह तो कभी सोचा ही नहीं। परिवार , रिश्तेनातो में जो कुछ लेना देना होगया, बस वही तक हमारी सोच रहती है।
हमने अपनी सोच का भी दायरा निर्धारित कर रखा है। सपनो का कोई गलियारा नहीं, सपने तो खुले आकाश में उड़ते हुए पंछी है , जो कंही भी आ जा सकते है। खुद के विचारो को और सपनो को मुक्त रखना ही हम ओर हमारे समाज के लिए शोभनीय है। हम अपने को खुश रखेंगे तभी हम अपने परिवार , अपने भविष्य ओर अपने समाज के लिए कुछ कर पायेंगे।
- अंकुर शरण
Saturday, November 13, 2010
सुखी राम - दुखी राम
सुखी राम ओर दुखी राम में सिर्फ एक फर्क है - सोच का। हमने मान लिया की ये जो हो रहा है वही हमारी किसमत है, तो बस उसी का रोना रोते हुए जीवन काट देते है। वही कुछ ऐसे भी है जो हर हाल में खुश रहने के लिए अपने जीवन से समाझोता नहीं करते ओर वो सब कार्य करते है जो उन्होंने चाहा है।
हम सब की आत्म कथा है।
अपने कुछ मित्रो के जीवन में ऐसा कुछ देखा की मन् सिहर जाता है। एक की माँ को कुछ लुटेरो ने सिर्फ इस बात पर गोली मार दी की उन्होंने उनका विरोध किया। बचपन से जिनको देखा, उनकी खून से सनी लाश ने काफी आक्रोश भर दिया है, हम सब चुप है - क्योंकि इसी में सब की भलाई समझते है । 







