Sunday, May 12, 2013

माँ - स्नेह का पहला नाम


प्यार और स्नेह का पहला नाम माँ ही हो सकता है। माँ की सबसे खास बात उसका अपने बच्चो के प्रति लगाव होता है, चाहे वो आप की माँ हो या मेरी। सृष्ठी में कुछ चीज़े अटल है, सूरज का रोज हमारे जीवन में प्रकाश लाना, चाहे चन्द्रमा के प्रकाश से रात्रि को खुशनुमा बनाना और इन्ही पहरों के बीच माँ का उठाना और सुलाना। कितना अनोखा एहसास है ना !

हमारी मुस्कान से माँ खुश हो जाती है तो कभी क्रोध से दुखी। कभी प्यार से अपने गले लगा लेती तो कभी गुस्से में आँखे दिखा देति। क्या करे माँ जो है, अपने बच्चो को हर हाल में खुश और सुखी जो देखना चाहती है। माँ का बच्चो से ऐसा गहरा रिश्ता होता है की आपने भी महसूस किया होगा की बिना बाताये वो हर चीज़ समझ जाती हैं। जादू तो नहीं, यही अटूट स्नेह है।

अच्छा लगता है, माँ के लिए भी कोई खास दिन बनाया गया -आज के जीवन का यही दस्तूर भी है और सच्चाई भी। हर खास दिन को खास तरह से अपने जीवन को खुशनुमा बनाते रहना चाहिए। वो हर प्रयास करना चाहिए जिससे आप किसी को २ पल की खुशियाँ दे सके, क्या और कैसे वो तो हम दिल से करे उसी में माँ खुश है।

मेरी ये व्यक्तिगत राय है, एक परिवार को माँ से बेहतर कोई नहीं समझ सकता। माँ से ही हमे रिश्ते नातों की समझ आती है और एहसास उन् रिश्तो को अपने दिलो दिमाग में जीने का।
एक एक कड़ियों की तरह हमारा जीवन हर दिन जुड़ता जाता है, इस जोड़ को मजबूती हमारी माँ ही देती है। वो हमारा ख्याल तो रखती ही है और साथ में उन् विपरीत स्थितयों में हमारा मार्ग प्रशस्थ करती है जिससे हमे मंजिल मिलती है। हम खुश होते है और अपने आप को शाबाशी देते है या दोस्तों के साथ मौज मस्ती में रम जाते है। माँ उसमे भी खुश है।
हमारे हर एक उपलब्धि में माँ बाप का हाथ और भरोसा होता है। वही भरोसा जब हब हम चलना सीखते है ओर गिरते है, रोने पर माँ को दर्द होता है तो पिता को बल मिलता है और प्रयास करने का जिस्से बच्चा अपने दोनों पाँव में खड़ा हो जाये। माँ खुद खिलाती है तो पिता बच्चे को स्वालंबी बनाता  है, जिससे वो खुद से मजबूत और स्वयं से हर कार्य करे।

माँ बाप बच्चो में ही अपना जीवन होम करते है और उनकी खुशियों में ही अपनी छोटी छोटी खुशिया तलाश के खुश हो जाते है।

जीवन का चक्र ही यही है, जो चलता रहेगा। माँ बाप अपने बच्चों की परवरिश करने में जरा सा संकोच नहीं होता और आज के नौजवान पीढ़ी को भी नहीं होना चाहिए। हर हाल में जितनी खुद को खुशियों की जरुरत है , उससे कंही ज्यादा अपने माँ-बाप को खुशियाँ देने से निसंकोच आगे से आगे अग्रसर होते रहना चाहिए।

जीवन में छोटी छोटी खुशियों को समेट के ही हम खुशनुमा माहोल बना सकते है, जीवन का नजरिया बदलने से कई राहे अपने आप दिख जायेंगी। बस कोशिश निरंतर करते रहने की जरुरत है। माँ को शत शत नमन और स्नेह - की आज हम जो भी है , वो उनके बलबूते के कारण हैं,  हम अपने माँ बाप का ऋण कभी उतार ही नहीं सकते।

माँ के इस खास दिवस में , आप सभी को दिल से बधाई। स्वस्थ जीवन और खुश रहने किए प्रेरणा का एक मात्र स्रोत्र हमेशा हम पर आशीर्वाद बरसाती रहे, इन्ही शुभकामनाओ के साथ अपने गलियारे में यह खास दिन धूम धाम से हर पल मानते रहे।

माँ की खुशियों से हमारी विजय पक्की है, प्रबल

विश्वास के साथ माँ-बाप की खुशिया सर्वोपरि रखते हुए , मन से वो हर कार्य करते रहना है जिससे हम स्वस्थ रहे और खुश भी। हम खुश है तो परिवार खुश, हम से जुड़े सारे रिश्ते नाते खुश, समाज खुश तो प्रेम स्वयं हमारे जीवन को महकाएगा।

माँ से ही अखंड भारत का सपना सच हो जाएगा।।

- अंकुर शरण

Sunday, March 31, 2013

दिलों में घोंसले


पेड़ो पर बहुत घोंसले देख लिए अब हर एक के दिल में घोसला बनाना है।
बचपन में गौरैया को अपने घर के आसपास घोसलों में देखता तो भी गलियारे में खड़ा हो कर  झुंड को उड़ते  हुए देखता और तोते को टाये टाये करते सुनता। लगता है बचपन के साथ इन् का भी दौर गुज़र गया। आज हम इतने व्यस्त हो हुके है  की अपने नन्हे परिंदों पर कभी ध्यान ही नहीं दिया। आज ये विलुप्त होने के कगार पे है।


अपने प्रकर्ति के लिए कुछ आभार व्यक्त करे और इन् नन्हे दोस्तों की मदद करे। हमारा एक छोटा सा प्रयास इन्हें   जीवन प्रदान कर सकता है। एक नन्हा सा घर या बाग़ में इनके लिए जगह और दाना  पानी रखे, शायद  इतना तो हम कर ही सकते है।

मैंने तो शुरुआत कर दी है, अब आप भी करें। दिल को सुकून मिलेगा और इन्हें सहारा।
आज मेरे घर जब गौरैया आती है तो मानो बचपन की मुस्कान लौट आयी।

जरुरी नहीं खुशियाँ पाने के लिए हम उन्हें घर पे खरीद के रखले, कुछ खुशियाँ तितलियों के समान होती है, बस उन्हें निहारते  रहे - ये आपके मन को छुलेंगी और  दिल में घोसला बना जाएँगी।


हमारे नन्हे दोस्तों की मदद के लिए कुछ संस्थाए आगे आयी हैं -ये हमारा काम और आसान कर रही है।


-अंकुर शरण

Wednesday, March 20, 2013

विचारों के बीज



आप जिन चीज़ों   को सबसे ज्यादा बार सोचते है या विचार रखते है, वो एक न एक दिन आप के पास होती है। कुछ उसी अवस्था में और हो सकता है उससे कंही ज्यादा। इन् पंक्तियों को पढ़ा था और इन्हें होता देख यकीं हो गया।

मुझे पेड़ पौधे से बड़ा लगाव है, शायद मेरे नाम का असर भी हो सकता है। बचपन में ननिहाल जाता तो पूरी छत रंग बिरंगे  फूलों  से सजी रहती। अक्सर गर्मी की छुट्टियों में जाना होता था, दिल उन् बाग़ के  फूलो को देख कर  खुश हो जाया करता और आज  भी मैं  गलियारे में उन् रंगों को समेट रखा हूँ ।

किसी काम को करना  है तो   लगन बहुत जरुरी है। जब कुछ चाहत मन में  होती  है  तो  अपने  आप  राहे  मिल  ही जाती है। हमारे निवास से कुछ दूर एक घर के बारे में सुना था, उनका बाग़ बहुत खूबसूरत है, बस मन के आगे किसका बस चला - चल दिए। बेहद खूबसूरती के साथ बाग़ को सज़ा रखा था।

मन  में इक्षा हुई की मैं उन् ज़नाब से मिलु, पर वो तब घर पे मौजूद ना थे। खैर कुछ तस्वीरे खिंची और घर चल दिए। अपने गमलो को देखता तो कभी क्यारियों को। समय के साथ उन्हें भी सवारने लगा। एक सुखद आनंद मिलता है जब आप हरे भरे पौधों को निहारते हो, वाकई में जान भर देते है ये नन्हे दोस्त मेरे।

फिर क्या था, एक और सपना अंकुरित हुआ और एक साल बाद मुझे एक बाग़ प्रदर्शनी के दौरान सम्मानित किया गया। जिन ज़नाब से मैं पहले नहीं मिल पाया, उन्हें प्रथम स्थान मिलते हुए देखा और मैंने उन्हें बधाई देते हुए धन्यवाद दिया। मेरे इस खास दिन का श्रेय, निसंदेह  उन्हें भी  जाता है।


अखबार में नाम प्रकाशित हुआ, एक सुन्दर  सी ट्रोफी मिली जिसे देख कर  परिवार जनों और मित्र बंधुओं को ख़ुशी मिली और मुझे एक सुकून क्योंकि अब कई और  सपने भी तो साकार करने है।

गलियारे में एक सीख भी मिली। हमे  हर उस  कार्य  में  सफलता  जरुर  मिलेगी - जिसे  हम  सच्चे मन  एवँ  सूझ - बूझ  के साथ  करते है।  मेहनत ज़रूरी है पर सही दिशा में। एक  विश्वास के साथ और  एक नए सपने को जीवंत करने के उमंग  के साथ। जीवन में  खुशियाँ  इन्ही    तरह  बटोरी  जा सकती हैं ,  खुशियाँ कंही  भी  कभी  भी  आपके  गलियारे  में आ सकती हैं, बस आशाओं के दरवाजे खोले रखे।

मेरी फुलवारी की सैर से आपको भी कुछ एहसास जरुर होगा, विचारों के बीज बस  अपने  मन  के  बाग़ में संजोते जाए -जीवन में हरियाली बनी रहेगी  ।

-अंकुर शरण

Tuesday, March 19, 2013

जीवन और स्वास्थ्य


आज के युग में अगर हम स्वस्थ है तो इससे बढ कर कोई ख़ुशी नहीं हो सकती। हमारी खुशियाँ हमारे ही हाथ होती है। अगर आप स्वस्थ है  तभी अपने घर परिवार को भी एक सुखद माहोल प्रदान कर सकेंगे। ये विश्वास करना होगा की हम जो कुछ करे उसका फायेदा हमे हो न हो  पर नुक्सान किसी को  न हो, तभी हम एक स्वस्थ समाज का निर्माण भी कर सकते है।

अब स्वास्थ्य  के लिए  चिंता करने की भी कोई जरुरत नहीं। चिंता से कभी परेशानिया दूर  नहीं  होती बल्कि हमारे दिमाग को और भी कुंठित कर देती है। सकारात्मक दृष्टिकोण रखे, आपको बल मिलेगा विपरीत परिस्थियों से निपटने का और दुसरो को समझाने का । कुछ चीजे  आप  परिस्थितियों  के  कारण  सीख जाते है। 

एक घटना जिसने हाल में मेरा जीवन  के प्रति  दृष्टिकोण बदल  दिया। मेरा छोटा भाई - जिसे ब्रेन हेमरेज हुआ और वक़्त रहते सही उपचार से उसकी  जान भी बच गयी और साथ ही आज वो जीवन को नए सिरे से शुरू कर रहा है। आसान तो नहीं होता पर इतना कठिन भी नहीं  अगर मन में बुलंद हौसले और स्वयं में विश्वास हो। अपोलो के महंगे उपचार और हर दिन के उतार चढाव ने जीवन को बेहद  कठिन बना  दिया  था, पर विश्वास और अपनों के साथ ने इस बेहद मुश्किल दौर को भी काट दिया।

सिर्फ एक काम - खुद को स्वस्थ रखने की हर मुमकिन  कोशिश करनी है और जीवन  में आने  वाली चुनौतियों का डट कर मुकाबला करना है । दुसरो से ज्यादा , खुद पर भरोसा करना है - स्वास्थ्य  को ठीक रखने के लिए किसी और की नहीं, आप के ख़ुद के प्रयास की ज़रूरत  है। अनुशाशन से हर कार्य संभव है। खुद के लिए समय निकाले, अच्छे विचारो को निरंतर पढ़ते रहे। स्वयं में इतनी जागरूकता आजायेगी की अपने आप, हर नामुमकिन कार्य संभव हो जाएगा और वैसे ही हमारा जीवन के प्रति नज़रिया।

Saturday, December 29, 2012

वो चली गयी



उस अंधकार की सुबह अब न होगी,
न उस शरीर की हालत अब और बत्तर होगी।
जितनी कायरता से समाज ने उसे ये दर्द दिया,
उसकी आत्मा भी हमे कही न कही कोसती होगी।

हम सब ने बहुत आँसू  बहा लिए,
धरना प्रदर्शन किया और मोम के दिए भी बहुत जला दिए।
आज भी हम उसी राह पर जा रहे है,
आज भी उन्ही बंद दरवाजो पे लटकती कुण्डी खटखटा रहे हैं।

फिर से कोई न कोई  सत्ता के गलियरो से आवाज दे देगा,
फिर से नया पैंतरा और परिवर्तन का आघाज़ हम में भर देगा।
रोज मर्रा की जिंदगी में हम फिर न खो जाये,
आज तो एक जुट हुए है,
कल फिर न इस दर्द को भूल जाये।

सब का साथ तो ठीक है,
पर अब द्रन्संकल्प भी चाहिए।
दिल्ली ही नहीं, देश की किसी गली में अब कभी यह घटना न होनी चाहिए।

वह चली तो गयी,
पर एक चिंगारी हमारे सीने में जला गयी है।
इतिहास के पन्नो में,
समाज की इस बर्बरता को आईना दिखा गयी है।

- अंकुर शरण

 

Friday, September 23, 2011

न वो वक़्त रहा, ना ये वक़्त रहेगा


जिंदगी दबी पाँव हमारे संग चलती जाती है, परिवर्तन होते जा रहे है ओर हम रोज भाग दौड़ की दिनचर्या में ही लगे रह जाते है। ये आज हर घर की कहानी हो गयी है, रोज भागो ओर शाम को थके मानदे आकर सो जाओ।



आखिर कब तक, जानवरों सा जीवन हम जीना है। ये हमारी कमजोरी है या हमारा नजरिया, जो हम रोज रोज एक ही तरह की दिनचर्या को देख के उन्हें अपने जिंदगी के साथ संजो लेते है। बस उसे ही अपने जीवन का पहलु मान लेते है। हम अपनी सोच के गुलाम हो कर, कुए के मेंढक की तरह जीवन गुजार देते है.

आज मैं बहुत कम चेहरे देखता हू, जो दिल से खुश दिखते है। किसी न किसी को कोई परेशानी सता रही है। सब चाहते तो है की वो खुश रहे पर कोई कुछ मेहनत नहीं करना चाहता। मैं मानता हू, सवाल पूछना जितना आसान होता है उतना शायद जवाब देना नहीं हो। मगर फिर भी हम यू ही जिन्दगी को तो नहीं जाने दे सकते।

आज इंसान सब चीज को बस में कर लेना चाहता है, दौलत, शोहरत। इतिहास से ही वर्तमान का जनम हुआ ओर भविष्य भी ऐसा ही होता आएगा जब तक हम अपनी मन् की धारणा को नहीं बदलेंगे।
हमे आज किसी और की नहीं बल्कि अपने आप की जरुरत है। खुद को देखो ओर खुद के करीब जाने की सोचो....उतना आसन नहीं होगा। हमने अपनी जिन्दगी सिर्फ ४ दिवारी के अन्दर सिमित जो कर ली है। हम वो कर रहे है, जो हो रहा है, वो तो सोच नहीं पाते जो हम भी कर सकते है।



३ घंटे सिनेमा देखना आसान है पर ३ मिनट भी हम खुद के लिए नहीं निकल पाते। जन्हा हम खुद से सवाल जवाब कर सके। खुद से पूछे - की क्या ये जो चल रहा है वो सही है? क्या हम इससे भी अच्छा कर सकते है? जरुर कर सकते है बस खुद पर विश्वास करने की देर है।

हमे ये समझना होगा की ये दिन जो है वो कल नहीं आने वाले। जैसे बचपन नहीं लौट सकता। अपने आज को हस के जीना है। विश्वास के साथ की जो होता है अछे के लिए होता है ओर यदि कुछ अच्छा नहीं हो रहा तो विश्वास रखना चाहिए की इस्श्वर ने जरुर हमारे लिए सोच रखा होगा।

एक सकारात्मक सोच ही क्रांति लाती है। कुछ नया करने की चाहत ही हमे दुसरो से अलग राह पर ले जाती है। हर इंसान की एक अपनी शख्सियत है। कभी खुद को निचा नहीं समझना है , भगवान् सब देखता है। जिसने वक़्त की नजाकत को भाप लिया वही एक सफल जीने की कला सीख पायेगा।

आज मैं भी जब महान हस्तियों की जीवनिया पढता हू, उनके लेख से ना जाने एक क्रांति सी आजाती है। बस अपने जीवन का अर्थ समझना चाहता हू। या ये कहू की जीवन एक राह है , अपना अस्तित्व पाने का।



अपने वक़्त को साथ रख कर वो हर काम करना है , जीसी हम करना चाहते है। किसी ने सच ही कहा है, न वो दिन रहे ओर ना ये दिन रहेंगे...!

Wednesday, November 17, 2010

सपनो का गलियारा

सपनो के गलियारे में हम ना जाने कितने बार आये गए। कुछ सपनो को हमने जिया तो कुछ अधूरे रह गए ओर हमारे जीवन के गलियारे के किसी कोने में पड़े रह गए। कभी चलते चलते दिख गए ओर फिर से उन्हें उठा लिया। ना जाने सपने इतने हसींन कैसेहो जाते है और कभी इतने दुखदायी भी।

हम हमेशा सपने की बात करते है, कल के बारे में सोचते है। आज से ज्यादा, कल पर यकीन करते है। क्या सपने इतने प्यारे होते ही हैं ? या सपनो को भी जीने के लिए हम सपनो की दुनिया की तलाश करते है? मैंने भी महसूस किया है, कई सपनो को सजीव करने की चाहत में हम आज को भूल जाते है ओर एक अलग सपने के पीछे भागने लगते है। हम यह भी ध्यान नहीं देते की कई सपने हमारे आज सच हो गए है, जिन्हें कभी हमने देखे थे।

भाग दौड़ में हम खुद को भुला बैठे है। अचानक किसी रोज़ बैठ कर फिर से अपने गलियारों में अतीत के लम्हों में चले जाते है। काश यह होजाता, काश ये कर लेते। हमे "काश " शब्द से अवकाश लेना है। हमे सपनो की सच्चाई को समझना है। हमे अपने मन् के हर ख्यालो का ख्याल रखना है ओर उसकी जरूरतों को खुद से जोड़ना है। क्या मन् में आने वाला ख्याल हमारे भले के लिए है भी की नहीं।

हम खुद को दुनिया का सबसे समझदार मानने की सब से बड़ी मुर्खता करते है। जो हो रहाहै वही सत्य है ओर जो होगा वो किस्मत। फिर सपनो का क्या ? सपने देखना चाहिए ओर सपनो को पूरा करने का हौसला भी खुद को देते रहना चाहिए। सपने जब हकीकत बन जाते है तो दुनिया में उससे ख़ुशी कंही और नहीं।

क्या सपने भी किस्मत देख के हमे चुन्न ते हैं?

नहीं न, फिर हम हर सपनो को बिना सोचे समझे क्यों सच करने में जुट जाते है? हमे जिंदगी में अपने सपनो के महत्त्व को समझना होगा, क्योंकि कल जब ये सपने पुरे हो तो उसे जीवंत करने की जिम्मेदारी भी हमारी ही होगी। हमे सपनो का दायरा बढ़ाना है। हमे अपने आप को सपनो से नहीं बल्कि सपनो को खुद से जोड़ना है। जो हो रहा है वो अच्हा है ओर जो होगा वो उससे भी अच्छा होगा।

हम भगवन से बहुत कुछ मांगते है, जो मिला उसे तो आशीर्वाद समझ लिया ओर जो न मिला - वो किस्मत के हवाले। हमे बचपन से मांगने की ऐसी आदत पड़ जाती है की उम्र भर बस मांगते ही रहते है। कभी भगवान से , कभी माँ बाप से, कभी दोस्त तो कभी पड़ोसी। हमारी मांगने की ऐसी आदत पड़ गयी है की हम देने की सोच से ही अज्ञान है। हम भी कुछ दे सकते है, यह तो कभी सोचा ही नहीं। परिवार , रिश्तेनातो में जो कुछ लेना देना होगया, बस वही तक हमारी सोच रहती है।

हमने अपनी सोच का भी दायरा निर्धारित कर रखा है। सपनो का कोई गलियारा नहीं, सपने तो खुले आकाश में उड़ते हुए पंछी है , जो कंही भी आ जा सकते है। खुद के विचारो को और सपनो को मुक्त रखना ही हम ओर हमारे समाज के लिए शोभनीय है। हम अपने को खुश रखेंगे तभी हम अपने परिवार , अपने भविष्य ओर अपने समाज के लिए कुछ कर पायेंगे।

- अंकुर शरण