Tuesday, July 6, 2010

हम परिवार से हैं ओर परिवार हम से। ये ही सोच को मैंने बचपन से माना है। एक ऐसी सोच जो परिवार का अर्थ आज भी हमारे दिलो दिमाग में जिन्दा किये हुए है।
इलाहबाद में कुछ ऐसा ही अनुभव बरसो बाद किया, नैनी - जन्हा हम ने बचपन के कई सुखद लम्हे बिठाये । आज उस माहोल से हम कोसो दूर हो चले है पर कंही किसी गलियारे में आज भी वो बचपन वन्ही से अकेला मुझे निहार रहा है।
परिवार के आदरणीय हमारे ताऊ जी की विदाई की वो शाम यादगार बन गयी। अपने परिवार जनों का साथ ऐसे समय में हो तो उससे बढ़ के कोई ख़ुशी नहीं हो सकती। शायद यही परिवार का अर्थ है। दूर हो के भी दिल एक है।
सभी से मुलाकात हुई, सब ने अपना अपना अनुभव अभिवक्त किया। कुछ ऐसे ही गुनगुनाते हुए शाम को अलविदा हमारी ताई जी ने किया।

Tuesday, June 22, 2010

सोच के भी रूह काप जाती है, जब आप मौत के बारे में सोचते है। कुछ ऐसी ही घटना भोपाल में भी घटी होगी। शायद तब मैं इतना समझ नहीं सकता पर हाल में इस त्रासदी को जिस ढँग से पुनः प्रस्तुत किया वो हमारे देश की एक बहुत ही शरर्मनाक रूप दर्शाता है।
"अतिथि देवो भवः " तो ठीक है पर हम इतने मजबूर क्यूँ हो जाते है की कोई भी आये और हमारी भावनाओ के साथ खेले, हमारे जीवन के साथ खिलवाड़ करे और फिर यही हम में से कोई गैर ज़िम्मेदार

Saturday, April 3, 2010

परिणय सूत्र

"माँ तब भी रोती थी"

हमे स्वयं नहीं पता कब कौन सी बात चुप चाप कुछ एहसास करा जाए। कभी कभी तो एक छोटी सी पंक्ति भी बहुत कुछ कह जाती है -


"माँ तब भी रोती थी जब बेटा रोटी नहीं खाता था और माँ आज भी रोती है जब बेटा रोटी नहीं देता"

कितनी ह्रदय विदारक यह पंक्ति है न? एक पंक्ति से मन् को कितनी ठेस पहुची तो उस माँ के कलेजे पर क्या बीतती होगी। माँ जो अपने जिगर के टुकड़े को ताउम्र अपने सीने से लगाये रखने का ख्वाब संजोती है, बस अपनी औलाद के सामने बेबस जान पड़ती है। क्या करे, माँ जो है।

हम इतने खुदगर्ज कैसे हो सकते है जो अपनी जननी को यह दिन दिखाए। यह एक हमारे समाज की एक सच्चाई है। लोग घर परिवार छोड़ देते है, कुछ अपने प्यार के लिए तो कुछ ऐशो आराम के लिए। कुछ कमाई के लिए तो कुछ शौक आजमाई के लिए। क्या कभी भला हो सकता है ऐसे समाज का जन्हा हम चाँद पर जाने की बात तो करते है पर चंद प्यार और रोटी अपनों को नहीं दे सकते।

Thursday, April 1, 2010

"अन्धो की बस्ती में"

मासूम अब ये जीवन की सुन्दरता नहीं देख पाएंगे, इस देश की यह एक भयानक हकीक़त से आज मैं अवगत हुआ। क्या ये दुर्भागया नहीं की जिन्हें हम कल का भविष्य मानते है उन्हें हम इस संसार में आने तो दे मगर उन्हें कुछ देखने न दे।

बिहार से फिर कुछ ऐसी खबरों ने दिल को भेद दिया। बच्चे, माँ के गर्भ में ही अंधे हो रहे है, दोष उनका कहे या हमारे देश की किस्मत का। आर्सनिक नाम के जहर ने इस कदर भूमिगत जल को विषैला कर दिया है की लोग बचपन से ही अंधेपन का शिकार हो रहे हैं।


एक अजीब सा डर बैठ गया है मन में। गाँव का जीवन, जिसे हम शहर के जीवन से सुखद समझते थे वो झूठा प्रतीति होने लगा है। लोग गाँव छोड़ कर शहर आते है और अब शहर की सीमा गावो की तरफ बढती जा रही है। प्रकृति से छेड़ छाड़ हा ही नतीजा है जो आज ये खबर गावो से होती हुई, हमारे कानो में गूंज रही है। वो दिन दूर नहीं जब अपनी तबाही के मनजर को हम तो देख लेंगे पर कल कोई न देख पाएगा और न ही दिखा पायेगा।



"मेरी बस्ती को आज लोग अन्धो की बस्ती के नाम से जानते है। यह बस्ती हमारे आज़ादी के करीब ६० दशक बाद ही पनपी है। यंहा हम सब बच्चे अंधे है, यकीं नहीं आता ना?"


"मैंने माँ से सुना है , मैं भी देख सकता था। पर मुझे भगवन ने नहीं, मेरे अपने देश के लोगो ने कुछ देखने न दिया। कसूर न मेरा है और न मरे माँ बाप का, कसूर तो बस हमारे देश की सोच का है। हम बदलाव की सोच तो रखते है पर उस सोच को सोचते ही रहते है। हम जीते तो है , पर बस जीते है। तड़प कर जिसमे हर सांस में मौत की सुगंध आती है। मेरे लिए रात दिन के कोई मायेने नहीं, मुझे तो हर वक़्त एक गूंज बदहवास कर जाती है। मैंने किसी का क्या बिगाड़ा था, या मैंने किसी को कौन सा झूठा वादा किया ? आज मैं क्या कर सकता हु, मेरी बहिन क्या करेगी? माँ बापू डरते है की उनके बाद हमारी देख रेख कौन करेगा। हम तो खुद इतने लाचार है..."


ये तो एक मन के भाव है जो अपने परिकल्पनाओ को शब्द दे रहा हु, पर हकीक़त से ये बहुत दूर नहीं। कल हो सकता है ये हकीक़त इस समाज की हो जाये। हम समाज की परिभाषा ही नहीं समझते। अपने परिवार के ४ सदस्यों को जान लिया बस इतना काफी है। समाज को जानना है तो पहले खुद को समजना पड़ेगा, नेता की सोच त्यागनी पड़ेगी। दिखावा नहीं, कुछ कर गुजरने की हिम्मत तभी आएगी। भविष्य तो दिख ही रहा है फिर आज से क्यूँ न अपने विचारो को बदला जाए और कुछ कदम इस तरफ भी उठाये जाए। एक कोशिश, किसी की जिंदगी बदल सकती है।


हमे दुसरो को नहीं, अपने आप को जगाना है। हमे मात्र अपने लिए ही नहीं, इस समाज को कुछ कुछ दे कर जाना है। स्कूल, कॉलेज, दफ्तर तो रोज हम सब जाते है और लौट आते है और कुंए का मेढक का जीवन जी कर रह जाते है।

ये तो हमारा दाइत्व नहीं, हमे खुद को हर दिन यकीं दिलाना होगा। हम भी इस समाज का अभिंग अंग है और हमे ऐसी हर परिस्थति का सामना एक जुट हो कर करना होगा। हमे स्वयं को बदलना होगा, समाज का अन्धो की बस्ती कहने वाले भी हम है और बनाने वाले भी। चोट देना आसन है पर मरहम लगा के हौसला देना बहुत कठिन।


"मैं अपने लेख से न ही किसी को हौसला दे रहा हु न ही अपने समाज को गाली। मैं एक कोशिश कर रहा हु, खुद को यकीं दिलाने का - की प्रयास ही जीवन है, कुछ प्रयास मानव सेवा के लिए किये जाए तो हम संभवता एक सकारात्मक जीवन जीने की प्रेरणा हम स्वयं को देते रहेंगे।"



Wednesday, March 31, 2010

"सोच का दामन"


जिन्दगी के ऐसे मोड़ पे हु जन्हा से कई राहे निकलती है और अब कोई एक मंजिल तक का सफ़र तये करना है। हम सब के जीवन में ऐसी कशमकश का दौर तो आता ही होगा। संगीत से प्यार करता हु और नौकरी का साथ देता हु। कोशिश तो कर रहा हु की समय का सद उपयोग करू, पर समय है की मुह चुरा के भाग जाता है। आज फिर उसी सोच में बैठा हु और विचार कर रहा हु की क्या हो सकता है।

सोचना नहीं,
बस अब कर गुजरना चाहता हु।
सुनना नहीं, अब कुछ सुनाना चाहता हु।
वक़्त नहीं,
पर वक़्त रहते अब कुछ कर गुजरना चाहता हु।


सोच के दामन में, बहुत देर सो लिया।
पाने की चाहत में, बहुत कुछ खो दिया।
अब कुछ और भी है, जिसे पाना चाहता हु,
अब कुछ कर गुजरना चाहता हु।


हसी भी आती है,
और फिर मुस्कुरा के चुप सा हो जाता हु।
खामोश पलों में , एक धुन बनाना चाहता हु।
मैं बस, कुछ कर गुजरना चाहता हु।


चाहत की इस आँख मिचोनी में,
कब तक छिपते रहेंगे-
मिली है जो ये हसी जिन्दगी,
खुल के बस अब यही कहेंगे।
सोचना नहीं,
अब अपनी सोच को और बढ़ाना चाहता हु,
कुछ कर गुजरना कहता हु।


हर कोशिश में एक आशा छुपी होती है और हर आशा के पीछे एक कोशिश का साथ हमेशा रहता है, शायद तभी हमारी सोच - एक अहम् भूमिका हमारे जीवन में निभाती है अपनी हर कोशिश को मुमकिन करना है तो अपने विचार को अपने साथ हमेशा रखना चाहिए। मैंने अपने कई सपने को सोच के दामन में सुला रखा है, कोशिश कर रहा हु अपने सोच को जगाने का ताकि वो हर मुमकिन प्रयास कर सकू जिससे आने वाले समय के साथ अपनी हर चाहत को साकार कर सकू।