Thursday, November 11, 2010

" छिन्द्वारा "

" छिन्द्वारा "

एक छोटा सा हरा भरा कटोरा मानो हरी हरी पत्तियों से भरा पड़ा है। स्वक्ष निर्मल हवा मानो रोम रोम खिला दी हो। एक अजीब सी चमक थी मेरी आँखों में।








अतीत से भाग दौड़

हम अपने अतीत से क्यूँ भागते है?
क्यूँ कुछ अतीत हमारे सुख चैन को छीन लेते है?
क्या वाकई में अतीत हमारा पीछा करते है या हम पीछे मुड़

हम ओर हमारा अतीत

Tuesday, July 6, 2010

हम परिवार से हैं ओर परिवार हम से। ये ही सोच को मैंने बचपन से माना है। एक ऐसी सोच जो परिवार का अर्थ आज भी हमारे दिलो दिमाग में जिन्दा किये हुए है।
इलाहबाद में कुछ ऐसा ही अनुभव बरसो बाद किया, नैनी - जन्हा हम ने बचपन के कई सुखद लम्हे बिठाये । आज उस माहोल से हम कोसो दूर हो चले है पर कंही किसी गलियारे में आज भी वो बचपन वन्ही से अकेला मुझे निहार रहा है।
परिवार के आदरणीय हमारे ताऊ जी की विदाई की वो शाम यादगार बन गयी। अपने परिवार जनों का साथ ऐसे समय में हो तो उससे बढ़ के कोई ख़ुशी नहीं हो सकती। शायद यही परिवार का अर्थ है। दूर हो के भी दिल एक है।
सभी से मुलाकात हुई, सब ने अपना अपना अनुभव अभिवक्त किया। कुछ ऐसे ही गुनगुनाते हुए शाम को अलविदा हमारी ताई जी ने किया।

Tuesday, June 22, 2010

सोच के भी रूह काप जाती है, जब आप मौत के बारे में सोचते है। कुछ ऐसी ही घटना भोपाल में भी घटी होगी। शायद तब मैं इतना समझ नहीं सकता पर हाल में इस त्रासदी को जिस ढँग से पुनः प्रस्तुत किया वो हमारे देश की एक बहुत ही शरर्मनाक रूप दर्शाता है।
"अतिथि देवो भवः " तो ठीक है पर हम इतने मजबूर क्यूँ हो जाते है की कोई भी आये और हमारी भावनाओ के साथ खेले, हमारे जीवन के साथ खिलवाड़ करे और फिर यही हम में से कोई गैर ज़िम्मेदार